ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को भारत में एक प्रभावी रणनीति के रूप में जाना जाता है : अपने अधिकारों या किसी कारणवश लड़ने के लिए सभी क्षेत्र की महिलाओं को एक साथ लाना। महिलाओं का समग्र सशक्तिकरण मुख्य रूप से आर्थिक सशक्तिकरण पर निर्भर है। आय सृजन गतिविधियों और लघु ऋण की मांग के अलावा महिलाएं इन स्वयं सहायता समूहों के जरिए स्वास्थ्य, खाद्य, कृषि, वानिकी इत्यादि मुद्दों पर काम करती हैं। इस तरह महिला सशक्तिकरण परियोजना (डब्ल्यूईपी) का मुख्य उद्देश्य प्रभावी स्वयं सहायता समूहों के रूप में महिलाओं को संगठित करना और इन स्वयं सहायता समूहों की स्थिरता के लिए इग्नू के प्रशिक्षण सर्टिफिकेट कार्यक्रम ‘स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिला सशक्तिकरण’ के माध्यम से मास्टर प्रशिक्षकों का एक नेटवर्क/कैडर तैयार करना है। इस उद्देश्य के लिए डब्ल्यूईपी ने सेटेलाइट डायरेक्ट रिसीविंग सिस्टम (डीआरएस) के साथ देश भर में 150 कार्यक्रम केंद्र भी स्थापित किए हैं। महिलाओं को सक्षम बनाने के लिए इग्नू मुख्यालय के विशेषज्ञों के साथ टेलीकांफ्रेंसिंग सत्रों के जरिए इन केंद्रों में संपर्क स्थापित किया जाता है। ये टेलीकांफ्रेंसिंग सत्र दूरदर्शन शैक्षिक चैनल ज्ञान दर्शन पर हर महीने पहले और चौथे शुक्रवार को 3.00 बजे से 5.00 बजे प्रसारित होता है। सभी अन्य शुक्रवार को 3.00 बजे से 4.00 बजे के बीच पाठ्यक्रम से संबंधित प्रासंगिक कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। नियमित फेस-टू-फेस काउंसलिंग भी कार्यक्रम केंद्रों और रेडियो काउंसलिंग आकाशवाणी के ज्ञानवाणी पर उपलब्ध है। विद्यार्थी नियमित रूप से ज्ञान दर्शन पर प्रसारित होने वाले अन्य शैक्षिक कार्यक्रमों से लाभ प्राप्त कर सकते हैं जो 24 घंटे का चैनल है। इन सभी कार्यक्रमों का विवरण सभी इग्नू विद्यार्थियों को हर महीने एक पुस्तिका के रूप में भेजा जाता है जिसे ज्ञान दर्शन कहते हैं।
सर्टिफिकेट कार्यक्रम के उद्देश्य :
- स्वयं सहायता समूहों के मास्टर प्रशिक्षकों को प्रशिक्षत करने के मौजूदा प्रयासों पर जोर देना
- देश में एक प्रभावी और स्थिर प्रशिक्षण नेटवर्क करना और ऐसे प्रशिक्षकों का एक संसाधन पूल विकसित करना।
- लैंगिक मुद्दों को सुलझाने के लिए और स्वयं सहायता समूहों की स्थापना में मदद के लिए प्रशिक्षकों और समुदाय आयोजकों के रूप में ज्यादा प्रभावशाली तरीके से काम करने के लिए चेंज एजेंटों को सशक्त करना।
- सूक्ष्म-उद्यमों की स्थापना के लिए दिशानिर्देश उपलब्ध कराना।
- मूलभूत कानूनी साक्षरता उपलब्ध कराना।
दूर शिक्षा कार्यक्रम सर्व शिक्षा अभियान के तहत मध्यवर्ती है, जिसे 1 जुलाई 2003 को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने विकसित किया है। इसका उद्देश्य देश में एसएसए के तहत दूर शिक्षा गतिविधियों को लागू करना है। देश के 28 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में दूर शिक्षा क्रियान्वयन के लिए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय जवाबदेह है। इस राष्ट्रीय स्तर की परियोजना का उद्देश्य दूर शिक्षा विधियों का इस्तेमाल करके शिक्षकों और अन्य प्रारंभिक शिक्षा पदाधिकारियों को प्रशिक्षित करना है।
डीईपी-एसएसए शिक्षक प्रशिक्षण के गुणवत्ता आयाम पर केंद्रित करता है जो देश में गुणवत्ता परक शिक्षा प्राप्त करने के लिए जरूरी है। आईसीटी का प्रभावी अनुप्रयोग ज्ञान, प्रेरणा, प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करने के लिए और शिक्षकों के बीच पेशेवर नजरिया विकसित करने के लिए जरूरी है। डीईपी-एसएसए के माध्यम से पदाधिकारियों को उनके कार्यस्थल से हटाए बिना शिक्षक प्रशिक्षण का प्रसार किया गया। एसएसए के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए निरंतर तरीकों और लगातार प्रयास के जरिए डीईपी-एसएसए गतिविधियां देश भर में कक्षा एक से सातवीं/आठवीं तक संचालित होती है। यह राज्यों में प्रभावी तौर पर काम कर रहा है राज्यों में मास्टर प्रशिक्षकों, ब्लॉक संसाधन केंद्रों और क्लस्टर संसाधन केंद्रों के समन्वयकों, डीआईईटी और एससीईआरटी के शिक्षकों जैसे स्थानीय कार्यकर्ताओं संवदेनशील बनाने के एक बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में यह एक प्रभावी काम कर रहा है। डीईपी-एसएसए दूर शिक्षा सामग्रियों जैसे मुद्रित सामग्री, आॅडियो, दृश्य, मल्टीमीडिया और टेलीकांफ्रेंसिंग के माध्यम से प्राथमिक स्तर की शिक्षा में क्षमता निर्माण की मौजूदा प्रक्रिया को मजबूती देता है। इसके तहत कार्यस्थल आधारित प्रशिक्षण और सामग्री उत्पादन का काम होता है। प्राथमिक स्कूलों के प्रभावी प्रबंधन के लिए यह पंचायती राज संस्थानों, स्कूल प्रबंधन संस्थानों, गांव और शहरी झुग्गी जमीनी स्तर, शिक्षा समितियों, पीटीए और एमटीए जैसे जमीनी स्तर के संगठनों के साथ नजदीकी समन्वय बनाकर काम करता है।
कम समय में काफी लोगों तक पहुंच बनाने दूर शिक्षा में काफी क्षमता है और देश में एसएसए गतिविधियों में दूर शिक्षा का काफी प्रभाव पड़ा है। शिक्षकों, कक्षा कार्य, समुदाय लामबंदी, बालिका शिक्षा इत्यादि के पेशेवर विकास के संदर्भ में राज्यों में इसकी उपलब्धि स्पष्ट है। डीईपी-एसएसए एक मिशन के रूप में कार्य करता है और इस प्रकार अब तक लाखों शिक्षक, परा शिक्षक, शिक्षकों को शिक्षा देने वाले और अन्य कार्यकर्ता प्रशिक्षित हो चुके हैं।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्रायोजित मानवाधिकार परियोजना का उद्देश्य ऐसे पेशेवरों को शिक्षित करना और संवेदनशील बनाना है जिनका वास्ता रोजमर्रा की जिंदगी में काफी लोगों से पड़ता है। परियोजना का इरादा मानवाधिकार की मूलभूत बातों के बारे अभ्यास आधारित शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों के अलावा पुलिस, अर्द्धसैनिक बलों, शिक्षकों, चिकित्सकों, एनजीओ कार्यकर्ताओं को इसमें शामिल करने का है।
इस परियोजना के अंतर्गत भूकंप के खतरे वाले देश के पांच राज्यों आंध्र प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश में 100-100 गांवों को शामिल किया गया है। इस परियोजना का उद्देश्य स्थानीय संस्थाओं की मदद से आपदा के बारे में जागरूकता पैदा करना और बनाए रखना है और सामुदायिक कार्ययोजना विकसित करके स्थानीय समुदायों की मदद करना है।
उड़ीसा में आपदा तैयारी में सामुदायिक जागरूकता को कृषि मंत्रालय ने प्रायोजित किया है और इसका उद्देश्य इस तटीय राज्य में 50 गांवों में जागरूकता पैदा करना और इसे बरकरार रखना है
इस परियोजना का उद्देश्य ग्रामीण युवकों को शिक्षित और प्रशिक्षित करने के लिए ज्यादा किफायती तकनीकें विकसित करना है। मुक्त एवं कृषि विश्वविद्यालयों की मदद से यह इस उद्देश्य के लिए एक शैक्षिक नेटवर्क स्थापित करने का विचार है।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य स्वस्थ मानव संबंधों, प्रभावी संचार और जिम्मेदार निर्णय लेने के व्यवहार के लिए शिक्षार्थियों में कौशल और ज्ञान विकसित करना है जो उन्हें और और दूसरों को एचआईवी/एसटीडी संक्रमण से बचाएगा। कार्यक्रम के उद्देश्यों में एचआईवी/एसटीडी संक्रमण रोकने वाले व्यवहारों और एचआईवी/एसटीडी संक्रमित व्यक्ति के प्रति भेदभाव करने वाले रवैया को बढ़ावा देना शामिल है।
इस कार्यक्रम में विकास कार्य के लिए युवाओं का प्रशिक्षण शामिल है और यह उच्चतर माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों और प्रासंगिक क्षेत्रों के अनुभवों वाले सभी विद्यार्थियों के लिए है। यह युवाओं की सामाजिक और औपचारिक शिक्षाक, सामाजिक-आर्थिक और राजनीति संदर्भ से जुड़े प्रश्नों को सुलझाता है।
परियोजना का उद्देश्य प्रौद्योगिकी आधारित सामुदायिक शिक्षण केंद्रों की स्थापना है जो साक्षरता सामग्रियों के उत्पादन में प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करेंगे। यह परियोजना राष्ट्रमंडल शिक्षण से अधिकृत है जिसमें भारत, बांग्लादेश और जांबिया शामिल हैं।
देश में किशोरियों के सफल शिक्षा कार्यक्रमोें के केस स्टडी के लिए एक अनुसंधान अध्ययन भारत सरकार और यूएन प्रणाली द्वारा अधिकृत है। अध्ययन का उद्देश्य ऐसी किशोरियों के लिए प्रासंगिक और अर्थपूर्ण शिक्षा कार्यक्रम तैयार करने की संस्तुति करना है जिन तक अब तक शिक्षा की पहुंच नहीं हो सकी है। प्रसार शिक्षा के लिए केंद्र ने बिहार में महिला शिक्षा केंद्रों की केस स्टडी की है। अध्ययन पूरा हो चुका है और रिपोर्ट भी सौंपी जा चुकी है।
स्वास्थ्य विज्ञान विद्यापीठ अभ्यासरत सहायक नर्सों, मेडवाइव्स (एएनएम) और महिला स्वास्थ्य कर्मियों (एफएचडब्ल्यू) के लिए एक कार्यक्रम तैयार कर रहा है जिसका उद्देश्य उनके ज्ञान और कौशल में इजाफा करना और स्वास्थ्य रक्षा उपलब्ध कराने में सामुदायिक भागीदारी को बढ़ाना है। कार्यक्रम में सामुदायिक स्वास्थ्य, सामुदायिक स्वास्थ्य नर्सिंग, प्रजनन बाल स्वास्थ्य नर्सिंग और सामुदायिक स्वास्थ्य का प्रबंधन शामिल है।
यह परियोजना प्राइस वाटरहाउस के माध्यम से एशियन विकास बैंक द्वारा मध्य प्रदेश सरकार को प्रदान की गई तकनीकी सहायता का एक हिस्सा है। इस परियोजना का प्रशिक्षण घटक इग्नू को सौंपा गया था। कार्यकताओं को जरूरी कौशल से लैस करने के लिए प्रशिक्षण पैकेज का प्रस्ताव मुद्रित सामग्री और श्रव्य -दृश्य घटकों को शामिल करने का है। इस परियोजना के तहत दृश्य कार्यक्रमों में एक को जापान में 1999 में सोनी/आईसीडी सम्मान मिल चुका है।
सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ एक कार्यक्रम विकसित किया है जो छह महीने के अनुभव के साथ नियमित रोजगार में लगे एनजीओ कार्यकर्ताओं के लिए है। कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीण इलाको में विभिन्न परियोजनाओं को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए विकास कार्यकर्ताओं के क्षमता निर्माण का है। कार्यक्रम में चार पाठ्यक्रम शामिल हैं जिनमें प्रत्येक के चार क्रेडिट हैं और इस समय यह केवल हिंदी में उपलब्ध है।
जिला प्राथमिक शिक्षा परियोजना (डीपीईपी) के सहयोग केरल में छह जिलों में तीन महीने का जागरूकता कार्यक्रम चलाया गया और यह 2001 में पूरा हुआ। 24 से 30 माता-पिता का समूह 15 केंद्रो में आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए और कुल 419 माता-पिता को दिशानिर्देश दिए गए।
यह कार्यक्रम विशेषकर ऐसे किशोरों के लिए तैयार किया गया है जिनकी पढ़ाई सुविधा न होने के कारण 8वीं से 10वीं के बीच छूट गई। यह कार्यक्रम हिंदी में है। पहली बार यह 1998 में शुरू हुआ। कार्यक्रम के तीसरे चरण में इसका प्रसार 27 कंप्यूटर केद्रों तक हुआ जो दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में हैं। नवंबर 2001 में यह पूरा हो गया। प्राप्त फीडबैक के आधार पर कार्यक्रम में संशोधन करके इसमें डीटीपी और कंप्यूटर संयोजन को शामिल किया गया। इस कार्यक्रम में 2000 से ज्यादा विद्यार्थी पंजीकृत हैं।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जमीनी/कम साक्षरता वाले स्तर पर महिलाओं के सशक्त बनाना है जिसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय के महिला एवं बाल विकास विभाग (डीडब्ल्यूसीडी) के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में सभी के लिए कुछ छूट प्रदान की गई है जैसे 18 साल से अधिक के वे अभ्यर्थी जो अपने शिक्षण माध्यम के लिए स्वीकार भाषा (हिंदी, अंग्रेजी, गुजराती, तमिल, मराठी और ब्रेल) को पढ़ सकते हैं और लिख सकते हैं वे इसमें शामिल हो सकते हैं। साथ ही, डीडब्ल्यूसीडी और नाबार्ड द्वारा शुल्क की प्रतिपूर्ति के रूप में प्रोत्साहनों की पेशकश की गई है। इस परियोजना की सबसे खास विशेषता समाज के वंचित वर्गों के साथ नियमित रूप से टेलीकांफ्रेंसिंग के लिए देश भर के 150 केंद्रों में प्रत्यक्ष उपग्रह ग्राही प्रणाली की स्थापना है।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जमीनी/कम साक्षरता वाले स्तर पर महिलाओं के सशक्त बनाना है जिसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय के महिला एवं बाल विकास विभाग (डीडब्ल्यूसीडी) के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में सभी के लिए कुछ छूट प्रदान की गई है जैसे 18 साल से अधिक के वे अभ्यर्थी जो अपने शिक्षण माध्यम के लिए स्वीकार भाषा (हिंदी, अंग्रेजी, गुजराती, तमिल, मराठी और ब्रेल) को पढ़ सकते हैं और लिख सकते हैं वे इसमें शामिल हो सकते हैं।
साथ ही, डीडब्ल्यूसीडी और नाबार्ड द्वारा शुल्क की प्रतिपूर्ति के रूप में प्रोत्साहनों की पेशकश की गई है। इस परियोजना की सबसे खास विशेषता समाज के वंचित वर्गों के साथ नियमित रूप से टेलीकांफ्रेंसिंग के लिए देश भर के 150 केंद्रों में प्रत्यक्ष उपग्रह ग्राही प्रणाली की स्थापना है।
इस परियोजना के तहत भारत के ग्रामीण और शहरी स्कूलों में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी शिक्षा परियोजना 2000+ के लिए यूनेस्को संसाधन किट 26 माड्यूल्स के पूर्व-परीक्षण की आवश्यता है। माड्यूल्स पर प्राप्त फीडबैक और प्रतिक्रिया को किट के अंतिम प्रसंस्करण को तैयार करने में किया जाएगा। इस किट के जरिए दुनिया भर के विज्ञान के अध्यापक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और अधिक आकर्षक, सुलभ और
अपने विद्यार्थियों के लिए प्रासंगिक बनाने में सक्षम होंगे।
विस्थापन, पुनरूद्धार और पुनर्वास के सहभागी प्रबंधन पर स्नातकोत्तर सर्टिफिकेट कार्यक्रम सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ का पहला ऑनलाइन पाठ्यक्रम है। यह स्नातकोत्तर सर्टिफिकेट कार्यक्रम विश्व बैंक और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की एक सक्रिय पहल और एक परियोजना का नतीजा है। जुलाई 2001 से आर्थिक संकाय और समाजशास्त्र संकाय इस ऑनलाइन कार्यक्रम को संचालित कर रहा है। जनवरी 2002 से यह कार्यक्रम ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध है। कार्यक्रम का उद्देश्य विस्थापन, पुनरूद्धार और पुनर्वास में सहभागी प्रबंधन कौशल उपलब्ध कराना है। यह कार्यक्रम उन लोगों के लिए है जो सरकार की विकास परियोजनाओं के पुनरूद्धार और पुनर्वास प्रभागों में, निजी क्षेत्र में परियोजना अधिकारी के रूप में, गैर सरकारी संगठनों में फील्ड स्टाफ और डेस्क स्टाफ के रूप में, औद्योगिक प्रतिष्ठानों में और पुनरूद्धार व पुनर्वास के काम में लगी अन्य एजेंसियों में कार्यरत हैं। इस कार्यक्रम के बारे में विस्तार से जानने के लिए एक वेबसाइट ँ३३स्र://११ङ्मल्ल’्रल्ली.ङ्म१ॅ की मदद ली जा सकती है। यह कार्यक्रम एक मल्टीमीडिया पैकेज है जिसमें पांच पाठ्यक्रमों में 16 क्रेडिट शामिल हैं।
वृद्धों की शिक्षा के लिए एक राष्ट्रीय स्तर के केंद्र -ईडीएजीई की स्थापना केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय कार्यबल द्वारा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय नई दिल्ली में हुई। वृद्धों की ओर अभिमुख शिक्षण/अध्ययन सामग्री, एक व्यापक सूचना सहायता के प्रसार और विकास पर विचार करने की यह एक राष्ट्रीय पहल है। वृद्धों के लिए शिक्षा के विभिन्न पहुलओं से जुड़ी सूचनाओं के प्रसार के लिए यह केंद्र एक केंद्र बिंदु है और एक प्रलेखन केंद्र के रूप में भी काम करता है। केंद्र वृद्धों की शिक्षा से जुड़े विषयों पर काम करने वाले सभी संस्थानों की गतिविधियों पर जानकारी इकट्ठा करने और प्राप्त करने का आदेश भी देता है।
इस परियोजना का उद्देश्य निर्माण क्षेत्र में कार्यरत कर्मियों के कौशल विकास के लिए दूर माध्यम से दक्षता आधारित व्यावसायिक प्रशिक्षण, मूल्यांकन और प्रमाणपत्र प्रदान करना है।
पहले दृष्टांत में, परियोजना सामान्य राजमिस्त्री, बढ़ई और कार्य पर्यवक्षक की मूल दक्षता को शामिल किया गया है। इस परियोजना को बिल्डर्स एसोसिएशन आफ इंडिया (बीएआई), नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कार्पोरेशन (एनबीसीसी) और नेशनल एकेडमी आफ कंस्ट्रक्शन (एनएसी) हैदराबाद की सहायता से क्रियान्वित किया गया।
वर्ष 1999 में कंप्यूटर एवं सूचना विज्ञान विद्यापीठ ने अपना आभासी परिसर उपक्रम (वीसीआई) शुरू किया और इसके तहत निम्नलिखित दो कार्यक्रमों को शुरू किया :
1- सूचना प्रौद्योगिकी में स्नातक (बीआईटी)
यह एक तीन वर्षीय पूर्व स्नातक डिग्री कार्यक्रम है जिसमें पाठ्यक्रम एडएक्सेल फाउंडेशन, ब्रिटेन से उच्चतर राष्ट्रीय
डिप्लोमा (एचएनडी) का सम्मान और भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा प्रायोजित एक वर्षीय हाई-एंड स्नातकोत्तर
डिप्लोमा कार्यक्रम सूचना प्रौद्योगिकी में अग्रिम डिप्लोमा (एडीआईटी) शामिल है।
इस कार्यक्रम की खास बातें निम्नलिखित हैं :
- संचार सुविधाएं और कंप्यूटर कला की स्थिति को प्रदर्शित करते हुए टेलीकांफ्रेंसिंग केंद्रों के जरिए ऑनलाइन शिक्षण/अध्यापन।
- सीखने पर हाथों पर जोर।
- नतीजा आधारित शिक्षण।
- बीआईटी में सामान्य कौशल का एकीकरण। (ब्रिटेन में मुख्य कौशल के रूप में माना जाता है)
- विश्वभर में पूर्व स्नातक डिग्री कार्यक्रम में प्रगति के लिए एचएनडी के माध्यम से क्रेडिट्स का स्थानांतरण।
वर्ल्डवाइड वेब के माध्यम से उपलब्ध शैक्षिक संसाधनों की भारी मात्रा का प्रदर्शन । दोनों कार्यक्रमों को शिक्षाविदों और विद्यार्थियों से काफी प्रशंसा मिली है। प्रवेश परीक्षा के माध्यम से इन कार्यक्रमों में प्रवेश दिया जाता है।
कृषि आधारित व्यावसायिक कार्यक्रम ‘मशरूम उत्पादन’ नवंबर 2000 में शुरू हुआ। यह चार महीने का कार्यक्रम है। यह एक मल्टीमीडिया शिक्षण पैकेज है जिसमें निम्नलिखित चीजें शामिल हैं :
हिंदी और अंग्रेजी दोनों में सचित्र मुद्रित स्व-अध्ययन सामग्री।10 दृश्य कार्यक्रमों का सेट ‘मशरूम उत्पादन’ पर तीन कार्यक्रमों का एक 60 मिनट का आॅडियो।
पाठ्यक्रम में एक प्रायोगिक तत्व है जिससे चिह्रित कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) और निजी उत्पादक उपयुक्त स्थानों पर सहायता देने में शामिल हैं। पायलट चरण के दौरान जो मार्च 2001 में पूरा हुआ तीन फोन-इन रेडियो कार्यक्रम आयोजित किए गए। दूसरा चरण नवंबर 2001 से शुरू किया गया। इसके बाद प्रशिक्षुओं से प्राप्त फीडबैक और कार्यक्रम के मूल्यांकन के जरिए इसका संशोधन किया गया।
विकास कार्य में युवा (सीवाईपी) अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन के लिए एक
महत्वपूर्ण खोज है। बदलती दुनिया में चुनौतियों की सामना करने के लिए युवाओं को सशक्त, सुनिश्चित और सक्षम बनाने के लिए यह एक पहला राष्ट्रमंडल व्यापक शिक्षा है।
पैन राष्ट्रमंडल कार्यालय पूरे राष्ट्रमंडल में पिछले 21 वर्षों से यह कार्यक्रम संचालित कर रहा है और अब इसने इसे भारत में दूर माध्यम के जरिए इग्नू के सहयोग से पेश किया है। यह एक अनूठा दक्षता आधारित कार्यक्रम है जो विकास कार्यों में युवाओं की क्षमता को विकसित करने के प्रयास में लगा है। इसके उद्देश्य निम्नलिखित हैं :
1- अपनी तरफ से काम करने के लिए युवाओं को सक्षम बनाना।
2- यह सुनिश्चित करना कि युवा मूल्य आधारित प्रणाली के अनुसार काम करते हैं जो ऐसी भावना और अर्थ प्राप्त होती है कि युवा अपने ज्ञान और कौशल का इस्तेमाल किस तरह करें।
3-लोकतांत्रिक सिद्धांतों के साथ युवाओं का सशक्तिकरण ताकि युवा देश की निर्णय लेने की प्रक्रिया में रचनात्मक और स्वीकारात्मक भूमिका निभा सकें।
सीओएल के सहयोग से शुरू इस परियोजना का उद्देश्य चिह्रित इलाकों में ग्रामीण युवाओं के शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त संचार प्रौद्योगिकी और शिक्षा के लिए किफायती विधियां विकसित करना है। परियोजना को हरियाणा और उत्तर प्रदेश के चिह्रित जिलों में शुरू किया जाएगा। इसके उद्देश्य निम्नलिखित हैं
1- औद्योगिक सब्जी उत्पादन
2- फल नर्सरी उत्पादन
पांच दृश्य फिल्म तैयार की जा चुकी हैं जबकि सात पर काम चल रहा है। स्व-निर्देशित मुद्रित सामग्री और आॅडियो कैसेटों का भी निर्माण किया जा रहा है।
पहला प्रशिक्षण कार्यक्रम ‘आलू उत्पादन’ पर हस्तिनापुर के कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) में 19 से 23 दिसंबर 2001 को आयोजित किया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए स्व-निर्देशित मुद्रित सामग्री और आडियो कैसेटों का भी निर्माण किया गया।
दूर शिक्षा माध्यम से व्यावसायिक प्रशिक्षण के जरिए फुटवेयर उद्योग में नए सिद्धातों का परिचय, शैक्षिक और प्रायोगिक अंत: क्रिया के प्रोत्साहन के लिए 26 अगस्त 2003 को इग्नू -एफडीडीआई (फुटवेयर डिजायन एंड डेवलपमेंट इंस्टीच्यूट) नोएडा के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया। उपर्युक्त परियोजना में, तीन सर्टिफिकेट कार्यक्रम और एक डिप्लोमा कार्यक्रम फुटवेयर प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में शुरू किया जाएगा। एफडीडीआई, भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था है।